खेल, मन का! देखा है कभी मन में अपने झाँक कर? कुछ मैल वहां भी पडा मिलेगा। अधूरे ख़्वाबों का इल्जाम देकर, कितनों को वहाँ दफनाया होगा। वक्त मीले कभी तो एक एक टटोलना, बेबुनियाद इल्जाम देकर कितने मासुमों को तूने खुद दफनाया होगा। होते ये काम, अंदर चल रहा शोर कम होगा। आनेवाला हर इन्सान फिर तेरा दोस्त होगा। मन का ये खेल है निराला, जो चाहे वो ना मिले तो करता है मासूम बन ये कत्ल सारा। एक बात समझ यारा, हर ख्वाब गर होता मुक्कमल तेरा, खुदा या शैतान बन चला जाता तू छोड़ ये बसेरा। -योगेश गोसावी १५ सितंबर, २०२०