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Showing posts from March, 2020

रास्तें

रास्तें रास्तों कों भी समझ ना आ रहा कि आखिर करना क्या? बिन हम मुसाफ़िरोंके युहीं पड़े रेहना क्या। चले दो कदम किसीके, तो उसे मंजिल दिला दे। आये ना गर कोई पास, तो किसे रास्ता दिखा दे? गुरुर उनका भी देखो, थोड़ा आज कम हो गया। बिन मुसाफिर के रास्ता भी, अपना होश खो गया। दो कदम ही सही, आज तुम्हें चलना होगा। मेरी खातिर ना सहीं, रास्ते के लिये कदम उठाना होगा। कदम ना तुम्हारें उनपर चले, तो रास्ता भटक जायेगा। मुसाफिर फिर हम जैसा, युहीं गुमशुदा रेह जायेगा। -योगेश गोसावी २७ मार्च, २०२०

आझादी

आझादी घरसे ना निकलना हमारा कुछ तो गजब ढा गया। परिंदो को थोड़ासा खुला आसमान दे गया। ना मिलना हमारा शायद थोड़ा बुरा होगा। ले लेने दो इनको ये मजा जो शायद फिर ना होगा। आझादी का मजा घर बैठ कर समझ आया। घूमती हुई दुनिया को जब थमता हुआ पाया। बस थोड़ेही दिनों की है ये बात, फिर होगी हर एक मुलाकात। आझादी का तब हम जश्ऩ मनायेंगे। ईन दिनोंको पर कभी न भुलायेंगे। -योगेश गोसावी २५ मार्च, २०२०

शायद

शायद पूछनी पडती है आजकल पसंद नापसंद, खुल के बोलने का जमाना गया शायद। देनी पडती है सबको ही अहमियत, खुद कमाने का जमाना गया शायद। चाहतों को भी चाहत से देखना आता है किसे याद। दुनियादारी कि होड़ में दिल को संभालना भूल गये शायद। -योगेश गोसावी २३ मार्च, २०२०

नींद

नींद बुला लिया किसीने जल्दीसे नींद को, कोई उसकी राह देखता रेह गया। राह देखते देखते उसकी, उसे कोई अनजान खयाल मिल गया। करली उससे बाते चार, तो मासूम वो मुस्करा गया। फिर थोडी और देर तक, वो खयाल नींद को दूर भगाता गया। चाहता गर बस नींद वो, जल्द उसे मिल जाती। वो ढूंड रहा था सुकून को, आप ही बताओ वो कैसे आती? -योगेश गोसावी २३ मार्च, २०२०