रास्तें रास्तों कों भी समझ ना आ रहा कि आखिर करना क्या? बिन हम मुसाफ़िरोंके युहीं पड़े रेहना क्या। चले दो कदम किसीके, तो उसे मंजिल दिला दे। आये ना गर कोई पास, तो किसे रास्ता दिखा दे? गुरुर उनका भी देखो, थोड़ा आज कम हो गया। बिन मुसाफिर के रास्ता भी, अपना होश खो गया। दो कदम ही सही, आज तुम्हें चलना होगा। मेरी खातिर ना सहीं, रास्ते के लिये कदम उठाना होगा। कदम ना तुम्हारें उनपर चले, तो रास्ता भटक जायेगा। मुसाफिर फिर हम जैसा, युहीं गुमशुदा रेह जायेगा। -योगेश गोसावी २७ मार्च, २०२०