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Showing posts from March, 2025

बंद दरवाजे, खुली खिड़कियां

बंद दरवाजे, खुली खिड़कियां दरवाजा जो बंद हुआ, वो तेरे कारण तो नहीं। खिड़की भी खुली है, तेरे रुकने से तो नहीं। आकाश को जो देखोगे, उड़ान ही की सोचोगे। दरवाजे के पीछे, क्यों ढूंढते हो अपनी नाकामयाबी? रुकना तो तेरी फितरत में कभी था ही नहीं। फिर आज ही क्यों रुके है तेरे पैर एक दरवाजे पे यूंही? बंद दरवाजे को यूं कब तक देखोगे योगी? खुली खिड़कियां भी दिखाती है आकाश के रंग सभी। ©गोसाव्यांचा योगेश १६ मार्च, २०२५