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Showing posts from November, 2020

सपनों का जहाँ

सपनों का जहाँ बात उस रात की हैं, जब चाँद ने रात आँखें मूँदकर गुजारी थी। दोनों को कोई भी ना देख पायें यहीं सब की गुजारिश थी। पलकों में छिपे सपने, उस दिन पलकों में ही पिघल गये। करवटे ही बदलते रहें, दोनों ना सो पायें। सासों की गर्मियों ने मौसम जैसे बदल दियाँ। सर्दि को भी उन्होंने गर्मी से जैसे झुलसा दियाँ। आयी थी सुबह उनके लिये एक नया सवेरा हात में थामे। पर शायद दोनों ने हकीकत से दामन अपना ओढ़ लिया। पूरी हो गयी नींद उनकी, जब दोनों को दुनियाने एकसाथ अलविदा किया। और फिर सपनों का एक जहाँ सपनों में ही पूरा हुआ। -योगेश गोसावी २३ नवंबर, २०२०