Skip to main content

Posts

Showing posts from 2025

बंद दरवाजे, खुली खिड़कियां

बंद दरवाजे, खुली खिड़कियां दरवाजा जो बंद हुआ, वो तेरे कारण तो नहीं। खिड़की भी खुली है, तेरे रुकने से तो नहीं। आकाश को जो देखोगे, उड़ान ही की सोचोगे। दरवाजे के पीछे, क्यों ढूंढते हो अपनी नाकामयाबी? रुकना तो तेरी फितरत में कभी था ही नहीं। फिर आज ही क्यों रुके है तेरे पैर एक दरवाजे पे यूंही? बंद दरवाजे को यूं कब तक देखोगे योगी? खुली खिड़कियां भी दिखाती है आकाश के रंग सभी। ©गोसाव्यांचा योगेश १६ मार्च, २०२५

मैं, कुछ अलग सा!

मैं, कुछ अलग सा! हुआ था प्यार मुझे, और तुम्हें भी। सही था, गलत था, इस विचार से कोसों दूर। बहना उसके कारण, गवारा न था मुझे, और तुम्हें भी। हसीन मोड था, हकीकत की दुनिया से कोसों दूर ही। लड़खड़ाए नहीं पांव मेरे, और तेरे भी। प्यारा सफर था, जितना ही था, भाग दौड़ से थोड़ा दूर ही। रास्ते अलग है अपने, जानता था मैं, और तू भी। आज भी इसलिए है चेहरों पे मुस्कान मेरे, और तेरे भी। रोजमर्रा की जिंदगी में आएं कभी आसूं मेरे, और तेरे भी। कर लेना याद तेरा मुझे सताना, और मेरा तुझे रुलाना भी। हकीकत हूं और थोड़ा अफसानासा, दोस्त है ये तेरा, जो कहता हैं, हां हूं मैं थोड़ा अलगसा। -गोसाव्यांच्या योगेश ५ फेब्रुवारी, २०२५