ग्रीष्म बरखा और ये शुरुआत है अंत की, ग्रीष्म के कहर की। है ये बरसात की, या किसीके अश्क की। मन में बस वहीं दिखेगा, जो है सोच में। वरना क्या भेद है, ग्रीष्म में बरसात में। जरूरी है वही है बरसता, दाह में या बूंदों में। कर बस इतना जतन, मन हो खुला हर हाल में। -योगेश गोसावी २९ जून, २०२०