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Showing posts from June, 2020

ग्रीष्म बरखा

ग्रीष्म बरखा और ये शुरुआत है अंत की, ग्रीष्म के कहर की। है ये बरसात की, या किसीके अश्क की। मन में बस वहीं दिखेगा, जो है सोच में। वरना क्या भेद है, ग्रीष्म में बरसात में। जरूरी है वही है बरसता, दाह में या बूंदों में। कर बस इतना जतन, मन हो खुला हर हाल में।  -योगेश गोसावी २९ जून, २०२०

फोन

फोन हर बार फोन उठाकर रख देता हूँ फिरसे, सोचकर पिछली बार कब याद किया था उसने। दोस्ती है, तो उसे भी निभानी होगी, मैं भूल जाऊं तो उसे भी याद दिलानी होगी। एक तरफा प्यार है तो उसे दोस्ती कौन कहे? रिश्तों का सारा बोझ एक ही कब तक सहे। सब सोचकर, जानकर फोन मैं ही करूँगा, एक तरफा प्यार हो, दोस्ती हो, मैं ही निभाऊँगा। -योगेश गोसावी २८ जून, २०२०

ना मिलना!

ना मिलना! ना मिल के भी तुमने ऐसे एहसान किया, कुछ राज़ को ना चाहते हुए रोशनदान दिया। कभी पता ना चलते ऐसे राज़ खोले तुमने। ना मिलने का वक्त अच्छी तरह निभाया तुमने। ना मिलना भी इसकदर रास आया हमें। खुद को संभालना खुद ही को सिखाया हमने। -योगेश गोसावी २३ जून, २०२०

भागदौड़

भागदौड़ आसानी से मिलते हो तुम, थोड़े सस्ते हो क्या? गर बिकना है थोड़ा महंगा, तो बेपरदा दिखना जरूरी है क्या? दिखोगे गर आते जाते, तो कोई दाम न देगा। ना मिलोगे कहीं तो ढूंढकर बड़ा दाम मिलेगा। ये रीत है निराली न मिलनेवाली हर चीज है प्यारी। जो पास है उसकी कीमतें है कहाँ किसको जाननी। ये योगी संभाल तू अपना दामन, जो है मिला उससे भर ले अपना जीवन। ना भाग तू व्यर्थ उसके पिछे, जिसमें दिखा ही नहीं तुझे कभी अमन! -योगेश गोसावी २२ जून, २०२०