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Showing posts from December, 2019

सफर

सफर उभरता साल पता नहीं सबको क्यों अच्छा लगता है? दिन मेरा पहला, गुजरते साल की याद में तड़पता है। दे जाता है कितनी अनोखी यादें, बातें और लोग। निकल जाता हैं चुपचाप दबे पाँव, बिना किये शोर। आनेवाला शोर करते आता है, दो दिन में वो भी पुराना सा लगता है। सफर जारी रहेगा यूँही, जबतक आप थकते नहीं। फिर भी नया साल का स्वागत करते आप रुकते नहीं। रुको, थोडा ध्यान तो दो। जानेवाला क्या दे गया, थोड़ा सोच तो लो। सफर तुम्हारां हो आसान यहीं है दुआ यारों। चलता रहे सफर निरंतर मेरी यहीं शुभकामनाएं प्यारों। -योगेश गोसावी १ जनवरी, २०२० 

स्री या पुरुष

स्री या पुरुष समंदर की येे लेहरें पता नहीं क्या कह रही है? पैर छूकर बुला रही है, या थोड़ा दूर धकेल रही है? पुरुष ही है ये सागर, जीनसे ये आती है। किनारे पे आते आते ये औरत क्यूँ केहलाती है? क्या बताती है ये कायनात, कुछ समझ नही आता! स्री से बनता है ये नर, या नर से आती हैं ये नारियां? या फिर है ये उसीकी कोई सोची समझी साजिश, जो बताती है दोनों से ही बनती है दुनिया? शायद सोच है अपनी अपनी, कोई साजिश नहीं, प्यार पे ही टिकी है दुनिया दूसरा कोई राज़ नहीं! -योगेश गोसावी २९ दिसम्बर, २०१९

शोर यादोंका

शोर यादोंका रात के सन्नाटेमें भी एक अलग शोर होता है, यादों के झगड़े सुननेका एक आलम होता है। कुछ चिखती हुई दिल देहला देती है, कुछ ख़ामोशसी उसी को सेहलाती है। झगडती है एक दूसरे साथ, पर निंद भाग जाती है। आप थक न जाओ तबतक ये कहा किसीका सुनती है। सुलह करलो उनसे तो थोड़ा सुकून मिल जाये। शोर करती ये यादें फिर हर रात रंगीन बनाये। -योगेश गोसावी २५ दिसम्बर, २०१९

बचपना जवानी का!

बचपना जवानी का! लगता है मैं अब भी बच्चा हूँ, इंतज़ार करने में थोड़ा कच्चा हूँ। अपनी दुनिया के कायदे तुम हमें ना बताना, रियासत का अपनी हूँ मैं इकलौता शहजादा। होगा थोड़ा मुश्किल तुम्हें हम से यूँ उलझना, ना कर पायेंगे हम कोई भी वफ़ा किसीसे दोबारा। लुटाने गर आये हो तो लूट ही जायेंगे, लेने गर आये हो तो बस यादें ही दे पायेंगे। हो मंजूर तो ईस बच्चे को ना और सताना, लूटो और भर जाओ अपनी यादों का खजाना! -योगेश गोसावी २३ दिसम्बर, २०१९

रूहानी जिस्म

रूहानी जिस्म गुजारा हो ही जायेगा तेरे बगैर मेरे दोस्त! जरूरते हमारी रूहानी थी और तेरी जिस्मानी! रूह कहीं से कोई तो धुंड ही लेगा, ना मिलेगी तो भी गुजारा कर ही लेगा। जिस्म तो तुम्हें हजारों मिलेंगे, न चाहो तो भी आ आ कर लिपटेंगे! कभी जो याद आयी तो खयालो में मिल लेना। जिस्म भी हमारा तुम्हें वहीं तड़पकर मिल ही लेगा! गर जरूरत लगे हमारी तो चले आना एकबार जिस्म उतारकर! मिल ही जायेंगे हम तुम्हें कही भी अपनी जान लुटाकर! -योगेश गोसावी २३ दिसम्बर, २०१९

वेहम

वेहम ढलती हुई ख़ामोशसी ये रात, थोडी और बदसूरत होगयी। जब मेरा आज का हौसला, कल की उम्मीदें साथ ले डूबने लगी। कौन जाने कल सूरज कौनसी मासुमसी रोशनी लायेगा? दिन के उजाले में चांदनी लायेगा या अपनी गर्म सांसो से हमे जलायेगा? ना जाने कहाँ से आती है ईतनी हिम्मत उलझनों में, की उलझा बैठती है बरसों से सुलझे हुए जमाने को। ये जमाना तो क्या कहीये, कहाँ सुनता है किसी की बात। बस होड में लगा रहता है लगाने तुमपे कोई दाग। दाग भी लगा दिया, तो भी ये कहाँ रुकेंगे मेरे यारा। कुछ न कुछ करके छिन लेंगे ये रिश्ता हमसे प्यारा। रास नहीं आयेगा हमारा यूँ आझाद जीवन सारा। करके कोई बात बिगाड़ेंगे फिर आशियाना हमारा! रेहना ये यहां तो सुन ले मेरी बात प्यारसे, छोड़ सारी उलझने और उड़ान भर दिलसे। रात की खामोशी भी फिर कोई गीत गुनगुनायेगी, सूर्य भी चांदनी देगा और चांदनी भी आग लगायेगी। मन ही का ये वेहम, ये कोई पाप पुण्य नही, हम सब ही है रिश्तेदार कोई जात पात नही। -योगेश गोसावी २३ दिसेम्बर, २०१९

सुलझी उलझने

सुलझी उलझने बेवफा तो तू नहीं, पर वफा भी कहा कर रहा? हजारो उलझने युं दिल में लेके चल रहा! काफ़िला छूट जाये ईससे पेहले संभल तो जा जरा, कुछ देर एक जगह बैठ अपनी उलझने तो सुलझा जरा! उलझनेही है ये, सुलझ तो जायेंगीही। कहा ये तुम्हांरे साथ आगेतक बढ पायेंगी। हौसला तो कर उनसे सामना करनेका, एक बार पलटकर तो देख काफ़िला अपनोंका। आदमीही है तू, भगवान तो नहीं। गिर कर उठना, उलझ कर सुलझना कुछ बुरा तो नहीं। हौसला बुलंद रखं अपनी चाहतोंका, एक दिन तू पा ही लेगा जहा मुक्कमल आसमानोंका। -योगेश गोसावी २० डिसेंबर, २०१९

द्वंद्व

द्वंद्व विचारांचं द्वंद्व जेंव्हा प्रत्यक्षात अवतरतं, सार अवकाश मग क्षणभर बघ थांबत! हातात आली संधी मग संधी उरत नाही, माझ्या वरची तुझी जबाबदारी पाठ सोडत नाही! मिळालेलं स्वातंत्र्य आणि प्रेम जाणीव करून देतात, मी ही आहे पुरुषोत्तम हे त्यामुळेच अनुभवू देतात! उचलेल पाऊल मग कसं योग्य ठिकाणीच पडत, मनात उठलेल काहूर अस आपोआप निवळत! -योगेश गोसावी १५ डिसेंबर, २०१९

अवघड वाटा

अवघड वाटा मृत्यू पण आता मित्रा सारखा वागतो, जरा आठवण काढली की पुढे उभा राहतो! प्रेमापेक्षा आजकाल मरण झालयं सोपे, प्रेमाला तरी आता कोणते गाव राहिलंय कोठे? प्रत्येक जण याच्यापासून लांब पळू पाहतोय, सरते शेवटी उपाय म्हणून यालाच मिठीत घेतोय! एकदा तरी थोडा विचार करून पाहा, मरायचं आहे एकदाच, रोज थोडं जगून तरी बघा! मरण आणि मारण्याच्या आहेत सोप्या वाटा, एकदा तरी अंगावर घ्या अवघड प्रेमाच्या लाटा! -योगेश गोसावी १० डिसेंबर, २०१९

मोहिका

मोहिका कानात सनई वाजू लागली, हृदयाची धडधड वाढू लागली! गोड अनामिक चाहुलीने गालावर लाली पसरू लागली! हळदीचा तोरा मिरवून झाला, मेंदीचा रंग रंगात आला! जवळ येणाऱ्या पावलांचा आवाज अजून गडद होऊ लागला! पण आत अजून कोठेतरी काय हे टोचतंय? कोणीतरी मला आत अजून का ओढतंय? माझंच आहे हे घर, मग आता परकं का भासतंय? सगळ्या स्वकीयांच्या गराड्यात एकटं का वाटतंय? हेच असतं का लग्न, सगळं सोडून निघणं? नव्याने आपलं जग दुसऱ्या सोबत वसवणं? सगळ्यांची काळजी घेणारी मी, माझी काळजी कोण घेईल? की तुम्हां सर्वांचे शुभाशीर्वाद मला किनारा दावतील? नकोत आता कुठल्या व्यर्थ ह्या चिंता, टाकता पाऊल एक एक सुटेल सगळा गुंता! दोघे मिळून चढवू संसाराची विट एक एक नवी, तुमची पावलं वाढवतील त्यात सुखं हवी हवी! -योगेश गोसावी २ डिसेंबर, २०१९