स्री या पुरुष
पैर छूकर बुला रही है, या थोड़ा दूर धकेल रही है?
पुरुष ही है ये सागर, जीनसे ये आती है।
किनारे पे आते आते ये औरत क्यूँ केहलाती है?
क्या बताती है ये कायनात, कुछ समझ नही आता!
स्री से बनता है ये नर, या नर से आती हैं ये नारियां?
या फिर है ये उसीकी कोई सोची समझी साजिश,
जो बताती है दोनों से ही बनती है दुनिया?
शायद सोच है अपनी अपनी, कोई साजिश नहीं,
प्यार पे ही टिकी है दुनिया दूसरा कोई राज़ नहीं!
-योगेश गोसावी
२९ दिसम्बर, २०१९
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