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वेहम

वेहम

ढलती हुई ख़ामोशसी ये रात, थोडी और बदसूरत होगयी।
जब मेरा आज का हौसला, कल की उम्मीदें साथ ले डूबने लगी।

कौन जाने कल सूरज कौनसी मासुमसी रोशनी लायेगा?
दिन के उजाले में चांदनी लायेगा या अपनी गर्म सांसो से हमे जलायेगा?

ना जाने कहाँ से आती है ईतनी हिम्मत उलझनों में,
की उलझा बैठती है बरसों से सुलझे हुए जमाने को।

ये जमाना तो क्या कहीये, कहाँ सुनता है किसी की बात।
बस होड में लगा रहता है लगाने तुमपे कोई दाग।

दाग भी लगा दिया, तो भी ये कहाँ रुकेंगे मेरे यारा।
कुछ न कुछ करके छिन लेंगे ये रिश्ता हमसे प्यारा।

रास नहीं आयेगा हमारा यूँ आझाद जीवन सारा।
करके कोई बात बिगाड़ेंगे फिर आशियाना हमारा!

रेहना ये यहां तो सुन ले मेरी बात प्यारसे,
छोड़ सारी उलझने और उड़ान भर दिलसे।

रात की खामोशी भी फिर कोई गीत गुनगुनायेगी,
सूर्य भी चांदनी देगा और चांदनी भी आग लगायेगी।

मन ही का ये वेहम, ये कोई पाप पुण्य नही,
हम सब ही है रिश्तेदार कोई जात पात नही।

-योगेश गोसावी
२३ दिसेम्बर, २०१९

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