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Showing posts from April, 2020

सुकून

सुकून आज फिर मेरा दिल रो पडा। लोग अच्छा बोले इसलिये किसी को मरना पडा। इंतजार उसके जाने का करते है, जीते जी एकबार जिक्र करना भी भूल जाते है। थोड़ी तो आदत बदलो मेरे यारो। जबतक है जान, दो बातें अच्छी कर ही डालो। जीते जी उसको थोड़ा सुकून मिल जाये, फिर चाहे जन्नत मिले या छूट जाये। -योगेश गोसावी ३० अप्रैल, २०२०

लॉकडाउन, एक वनवास!

लॉकडाउन, एक वनवास! खामोशसा ये जहाँ चीख चीख के कहता है, हमसे ना मिलके भी, हर कोई खुश रहता है। मिलनेका मौका पाना, किसे अच्छा नहीं लगता। पर खुद की जान के आगे, कुछ अच्छा नहीं लगता। ऐसा है, तो क्या सब ये रिश्ते नाते झुटे है? बिन मतलब के पाले, ये पालतू वेहम सारे है? रुको, ना पालो ऐसी सोच को दिमाग में। राम भी तो रहे थे, बिन सीता के वनवास में। किसी रावण का आना बहुत जरूरी होता है। तभी तो रामसा पुरुष, पुरुषोत्तम कहलाता है। -योगेश गोसावी १० अप्रैल, २०२०

रीत

रीत किसी और का एहसास हुआ, तो हर एक ने पूछा। जब खुद का एहसास हुआ, तो किसीने ना पूछा। कैसी है ये रीत दुनिया की, दूसरे के लिये तरसता है। खुद की बारी आये, तो युहीं मुकर जाता है। रीत ये तुम्हारी, कहीं तुम्हें ही न ले डूबे। हर बार किसी और के आंगन की धूल ही न बने। कुछ हो पाना तो, तुझे भी थोड़ा तड़पना होगा। होके बेकरार, तुम्हें भी तो कुछ करना होगा। -योगेश गोसावी ९ अप्रैल, २०२०