ऊंची इमारत बस एक ही इमारत पता है मुझे, जो शुरू होती है ऊपर से और नीचे जमीन पे खत्म होती है। बचपन की उड़ाने जैसे मेरी, आसमान से शुरू होकर अब जमीन पे आयी है। कुछ चाहते थी, कुछ सपने थे। आसमान का एक टुकड़ा मिल जाए ऐसे अरमान थे। बढ़ती उम्र ने, दुनिया की रीत ने, पटका है जमीन पे ऐसे, जैसे नींद में गिरे हो अपने ही सपने से। इमारत अब भी वही है, बस अब गुजारा नीचे ही होता है। बचपन का गुजरा बचपना अब ऊपर चढ़ने से रोकता है। -योगेश गोसावी १८ सितंबर, २०२१