कृष्ण तुम मनाओ खुशियां मेरे जन्म की, और मैं दुविधा में घिरा हूं अपनी ही। देवकी की हालत, अब तुम क्या समझोगे, बारात घर से खुद ले गए थे वसुदेव खुशियोंकी। जन्म मेरा भले ही हुआ था अधर्म के घने अंधियारे में, पर में खुद उजाला ले चला था देवकी की कोख से। धर्म रक्षणार्थ अवतार मेरा चाहा था सभी ने, बस कीमत उसकी देना सीखा था मेरे पांडवोंने। भले जमाना बदल गया कितना भी, परछाई आज भी मेरी दिखे, जो देखे नजर उधार ले मीरा की। पर राधा मेरी अब ना आयेगी लौट यहां, बांसुरी मैं अब भी बजा रहा उसी के लिए यमुना पार वहां। -गोसाव्यांचा योगेश १९ ऑगस्ट, २०२२