मिल का पत्थर राह चलते चलते मिला था मुझसे एकबार, मिल का पत्थर हस रहा था दूरसे बार बार। कुछ बता रहा था, कुछ पूछ भी रहा था। देख उसें मैं थोडा चौक भी गया था। बता रहा था राह सही है, मंज़िल तेरी दूर। पूछ रहा था क्यों आया अपनों को छोड दूर? सुन वो बात, थोड़ी देर मैं डगमगाया, कुछ पल बीते और पूनः लौट आया! मंजिल है दूर, पर जाना है वहीं, अपने भी आ रहे, मेरे निशानों को देख सही। मंजिले ऐसी कठिन, ना आयेंगी पकड़ में एकसाथ, किसीको तो बढना होगा आगे, अपनों का छोड हात। मिल जायेगा काफिला, मंजिल पे फिर एकबार, तब तक बस रखना तुम एक दूसरे पे ऐतबार। -योगेश गोसावी २९ जनवरी, २०२०