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Showing posts from January, 2020

मिल का पत्थर

मिल का पत्थर राह चलते चलते मिला था मुझसे एकबार, मिल का पत्थर हस रहा था दूरसे बार बार। कुछ बता रहा था, कुछ पूछ भी रहा था। देख उसें मैं थोडा चौक भी गया था। बता रहा था राह सही है, मंज़िल तेरी दूर। पूछ रहा था क्यों आया अपनों को छोड दूर? सुन वो बात, थोड़ी देर मैं डगमगाया, कुछ पल बीते और पूनः लौट आया! मंजिल है दूर, पर जाना है वहीं, अपने भी आ रहे, मेरे निशानों को देख सही। मंजिले ऐसी कठिन, ना आयेंगी पकड़ में एकसाथ, किसीको तो बढना होगा आगे, अपनों का छोड हात। मिल जायेगा काफिला, मंजिल पे फिर एकबार, तब तक बस रखना तुम एक दूसरे पे ऐतबार। -योगेश गोसावी २९ जनवरी, २०२०

खयाल जिंदगी का

खयाल जिंदगी का खयालो में रहना है तो, कुछ तो करना होगा। आज है अपने पास, उसे थोडा तो सवारना होगा। कल गर लगे भटक गये थे हम, तो वापस भी आना होगा। दिमाग में चलते इस द्वंद्व को, थोडा तो संभालना होगा। मुश्किल नहीं राहे जिंदगी पे चलना, बस थोडा गिरना संभालना सिखना होगा! -योगेश गोसावी २१ जनवरी, २०२०

हिंदी पंक्तियां

जाने क्या कहना था ऊसे, मैंने सुना ही नहीं! बात खुद की करते करते, मैंने कुछ समझा ही नहीं! उलझा रहा अपनी उलझनों में, मैं इस कदर, जो मेरा ही था, मैंने ऊसे पाया ही नहीं! -गोसाव्यांचा योगेश ११ सितंबर, २०१९ क्यूँ पुछ रहे हो हाल जनाब,  सब आपको पता है। बिन मिले आपको जी रहे है, यही एक खता है। -योगेश गोसावी १३ सितंबर, २०१९ बातें ना भायी मेरी तो भूल जाना उन्हें! आयीना दिखाना हर किसिको आता नहीं। गर ठीक लगे तो चले आना। मुझे भी दिखाना परछाइंया मेरी! -योगेश गोसावी ८ अक्टूबर, २०१९ उसने एक बार पुछ क्या लिया,  देखो जैसे कयामत आ गयी! मुझ जैसे भले इन्सान पर,  एक दिवानगीसी छा गयी! -योगेश गोसावी १२ नवम्बर, २०१९ ना जाने कौनसे गली से मुडना था मुझे? ना जाने कैसे भटक गया हुं मैं? ये क्या सोच रहा था मैं की ईसी एक मुकाम पे अटक गया हूँ मैं! -योगेश गोसावी १५ नवम्बर, २०१९ बुलानेसे ना आयेगी, ना बतानेसे जायेगी, मौत हे वो यारो, मनचली माशुका ही रहेगी! -योगेश गोसावी १९ नवम्बर, २०१९ बदल गया हूँ मैं ईसकदर, अपनों को भी बेगाना लगने लगा हूँ। पा  कर तेरी चाहत को, मैं कुछ अकेलासा हो गया हूँ। -योगेश गोसावी २...

सीमायें

सीमायें दूरियां इन सीमाओंकी कब मिटेगी यारा? कब पनपेगा प्यार इनमें दोनों तरफ सारा? पहल शायद उसे करनी है जो रूठा है सदियोंसे, तू ही चला था सालों पेहले जुदा होके तेरे अपनोंसे। गले लगाने गर तू आये, तो हम हसके फैलाये बाहें, हिम्मत कर एकबार सर उठाके मिलाने वहीं निगाहें। हिन्द है हम, हिन्द ही रहेंग, ना समझ बस हिन्दू हमे। तोड़ वेहम सारे पुराने, बढ़ आगे, फैला अपनी बाह पसारे। -योगेश गोसावी १० जनवरी, २०२०

वाट.... हरवलेली

वाट...हरवलेली नेहमीच पायाखाली येणारी वाट आज अचानक हरवली, दाट धुक्याने जेंव्हा तिच्यावर आपली चादर ओढली. वर्षानुवर्षाचे आम्हीं सोबती आज अचानक अनोळखी झालो! मळभ हे बाहेरचे दाटून येता थोडेसे बावरलो! ओळख अशी वर्षांची थोडीच आपण विसरणार? क्षणभराची विश्रांती आणि पुन्हां ओळख जागी होणार! येता हे असे दाट धुके, व्यर्थ चिंता नको! क्षणिक असते ही व्यथा, उगाच त्याशी द्वंद्व नको! -योगेश गोसावी १० जानेवारी, २०२०