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Showing posts from July, 2020

अच्छा नहीं लगता

अच्छा नहीं लगता कुछ तो गलत कर रहे है हम पर क्या? ये पता नहीं चलता। क्या करे समझ ना आये तब अच्छा नहीं लगता। सफर तो हर कोई कर रहा है। पूरा भी सब को करना है। किसी का पड़ाव इतनी जल्दी था।  ये सोच के अच्छा नही लगता। ऐसे निकल गया तू आधे रास्ते में, मिले तुझसे अरसा हुआ था। क्यूँ ना मिले फुरसत में कभी? याद करके अच्छा नहीं लगता। समझ आयी है किमत जिंदगी की, जो करना है आज, ये भी तय कर लिया दोस्त। पर ईसके लिये तुझे जाना पड़ा। ये जान के अच्छा नहीं लगता, अच्छा नहीं लगता। -योगेश गोसावी २२ जुलाई, २०२०

जिंदगी

जिंदगी गली में आखरी एक मकान है, सालों से आधा अधूरा ही है। रंग छोड़ो, दीवारें भी पूरी नही लगती। कभी उसे उजालों से जगमगाता नहीं देखा, पर हां, अंधेरेसे घिरा भी नहीं देखा। पता नहीं क्यूँ, ऐसा लगता है गली में बस वही जिंदगी रहती है। सुबह शाम हो या रात, कोई प्रहर हो, जिंदगी वहाँ खिलखिलाती सुनाई देती है। आते जाते हर कोई चौक जाता है, या कोई घृणासे नजर डालता है पर मन में ये संभ्रम जरूर ले जाता है कि कैसे? कैसे ये चहकते है? क्या ये राज है? एक दिन ठान लिया, टूटा सा उनका गेट पार करके रंग उड़ा हुआ दरवाजा खटखटाया। जिंदगी हसते हुए आयी, मुस्कुराकर अंदर बुला लिया! जादा कुछ था ही नहीं घर में जिसे हम सामान कहते है! पर हर एक चेहरा देखकर पता चला ये खुशी है, जिसे हम दिन रात घर से बाहर ढूंढते है। बिना वजह का मेरा आना उनको और खुशी दे गया और मेरी वजह छुपाना मुझे शर्मिंदा कर गया। गेट पर पहुँचते फिर पीछे मुडा, बोल दिया इरादा मेरा और कहाँ जानना था कैसे रहती है जिंदगी यहाँ ऐसे मुस्कुराते आज देखना था।  जवाब मिला, जिंदगी से हमने बस मुस्कुराना ही तो है मांग लिया। जरूरतें थोड़ी हमने कम पाल रखी है। इसलिए ही आते जाते हर...