जिंदगी
गली में आखरी एक मकान है, सालों से आधा अधूरा ही है। रंग छोड़ो, दीवारें भी पूरी नही लगती। कभी उसे उजालों से जगमगाता नहीं देखा, पर हां, अंधेरेसे घिरा भी नहीं देखा।
पता नहीं क्यूँ, ऐसा लगता है गली में बस वही जिंदगी रहती है। सुबह शाम हो या रात, कोई प्रहर हो, जिंदगी वहाँ खिलखिलाती सुनाई देती है।
आते जाते हर कोई चौक जाता है, या कोई घृणासे नजर डालता है पर मन में ये संभ्रम जरूर ले जाता है कि कैसे? कैसे ये चहकते है? क्या ये राज है?
एक दिन ठान लिया, टूटा सा उनका गेट पार करके रंग उड़ा हुआ दरवाजा खटखटाया। जिंदगी हसते हुए आयी, मुस्कुराकर अंदर बुला लिया! जादा कुछ था ही नहीं घर में जिसे हम सामान कहते है! पर हर एक चेहरा देखकर पता चला ये खुशी है, जिसे हम दिन रात घर से बाहर ढूंढते है। बिना वजह का मेरा आना उनको और खुशी दे गया और मेरी वजह छुपाना मुझे शर्मिंदा कर गया।
गेट पर पहुँचते फिर पीछे मुडा, बोल दिया इरादा मेरा और कहाँ जानना था कैसे रहती है जिंदगी यहाँ ऐसे मुस्कुराते आज देखना था।
जवाब मिला, जिंदगी से हमने बस मुस्कुराना ही तो है मांग लिया। जरूरतें थोड़ी हमने कम पाल रखी है। इसलिए ही आते जाते हर छोटी खुशी हमें जिंदगी जी भर जीना सिखाती है।
जिसें पाने मैंने क्या क्या नहीं किया, वो ख़ुशी का राज़ आज मुझे मेरी ही गली में, आधे अधूरे मकान में मिला!
-योगेश गोसावी
१५ जुलाई, २०२०
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