Skip to main content

अच्छा नहीं लगता

अच्छा नहीं लगता

कुछ तो गलत कर रहे है हम
पर क्या? ये पता नहीं चलता।
क्या करे समझ ना आये तब अच्छा नहीं लगता।

सफर तो हर कोई कर रहा है।
पूरा भी सब को करना है।
किसी का पड़ाव इतनी जल्दी था। 
ये सोच के अच्छा नही लगता।

ऐसे निकल गया तू आधे रास्ते में,
मिले तुझसे अरसा हुआ था।
क्यूँ ना मिले फुरसत में कभी?
याद करके अच्छा नहीं लगता।

समझ आयी है किमत जिंदगी की,
जो करना है आज, ये भी तय कर लिया दोस्त।
पर ईसके लिये तुझे जाना पड़ा।
ये जान के अच्छा नहीं लगता, अच्छा नहीं लगता।

-योगेश गोसावी
२२ जुलाई, २०२०

Comments

Popular posts from this blog

ऊंची इमारत

ऊंची इमारत बस एक ही इमारत पता है मुझे, जो शुरू होती है ऊपर से और नीचे जमीन पे खत्म होती है। बचपन की उड़ाने जैसे मेरी, आसमान से शुरू होकर अब जमीन पे आयी है। कुछ चाहते थी, कुछ सपने थे। आसमान का एक टुकड़ा मिल जाए ऐसे अरमान थे। बढ़ती उम्र ने, दुनिया की रीत ने, पटका है जमीन पे ऐसे, जैसे नींद में गिरे हो अपने ही सपने से। इमारत अब भी वही है, बस अब गुजारा नीचे ही होता है। बचपन का गुजरा बचपना अब ऊपर चढ़ने से रोकता है। -योगेश गोसावी १८ सितंबर, २०२१

पाऊस परतीचा

पाऊस निघाला आज पुन्हा परतुनी तुझ्या माझ्या सगळ्या चिंब आठवणी! घेवून का ग जाईल तो ते सारे हळवे क्षण? की ठेऊन जाईल ओथंबलेले मनातले पण? का कोण जाणे त्याचे जाणे अन् येणे वेडावत...

बॅक बेंचर्स

बॅक बेंचर्स अस किती दिवस चालायच, आम्ही किती अस झुरायच? तुझ्या एका नजरेसाठी आम्ही कितीदा मरायच? तू एकदा तरी बघशील म्हणून आम्ही प्रत्येक लेक्चर करायच, तू मात्र त्या काळ्या फळ्याकडे डोळे वासून बघायच! तुला आवडत नाही म्हणून आम्ही मागचे बेंच सोडायचे, आणि तू मात्र त्यांच्याच बरोबर चहाचे दुकान गाठायचे! आता नाही अस कधी होणार, कुणी नाही झूरणार की कुणी नाही मरणार, तुला सोडून प्रिये आता आम्ही खालच्या वर्गात जाणार! --योगेश गोसावी १७ जानेवारी २०१३