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Showing posts from 2020

वो अब बड़ा हो रहा है।

वो अब बड़ा हो रहा है। वो अब बड़ा हो रहा है, मेरे सवालों का जवाब दे रहा है। ना चाहते हुये भी, एक आईना हात में दे रहा हैं। कुछ गलतियां मेरी, अब वो समझ रहा है। जानकर भी उनको नजरअंदाज करने लगा है। मेरा हो कर भी आजकल मैं डरने लगा हूँ। परछाई है मेरी, मैं जरा संभल के चल रहा हूँ। मेरे पिता की खुशी और दर्द आज समझ रहा हूँ। उनके पथ पर चलना नहीं आसान, हर कदम जान रहा हूँ। माँ उसकी दोस्त है मेरी, अब वो जान चुका हैं। फायदा उसका अलग तरह से अब वो लेने लगा है। नन्ही जान अब कुछ तेजी से बड़ी हो रही हैं। लौट चुका बचपन मेरा, हर दिन दिखा रही है। प्यार वो अब सब से करने लगा है। बचपन मेरा अब जवानी की और चला है। -योगेश गोसावी ३० दिसंबर, २०२०

सफर प्यार का।

सफर प्यार का। मंझिले बदली, बदले रास्ते, बदले हमसफर पुराने। बस न बदली चाह मेरी, सब को साथ रखने की। एक खता हुई समझने में, मंझिल सबकी अलग ही है। तो ना चाहकर भी अलग ही होंगे रास्ते। बिछडते रहेंगे सारे यूँही अपनी मंझिल के वास्ते। कुछ देर और सही, चलना पड़ा अकेला। मंझिल जब सामने थी, तब एहसास हुआ। मंझिल गर होती सफर साथ चलने की, तो कितनी खुशनुमा ये जिंदगी होती। रुकना न पड़ता, बिछड़ना ना पड़ता, सफर ये प्यार का अपने साथ चलते रहता। -योगेश गोसावी ५ दिसंबर, २०२०

सपनों का जहाँ

सपनों का जहाँ बात उस रात की हैं, जब चाँद ने रात आँखें मूँदकर गुजारी थी। दोनों को कोई भी ना देख पायें यहीं सब की गुजारिश थी। पलकों में छिपे सपने, उस दिन पलकों में ही पिघल गये। करवटे ही बदलते रहें, दोनों ना सो पायें। सासों की गर्मियों ने मौसम जैसे बदल दियाँ। सर्दि को भी उन्होंने गर्मी से जैसे झुलसा दियाँ। आयी थी सुबह उनके लिये एक नया सवेरा हात में थामे। पर शायद दोनों ने हकीकत से दामन अपना ओढ़ लिया। पूरी हो गयी नींद उनकी, जब दोनों को दुनियाने एकसाथ अलविदा किया। और फिर सपनों का एक जहाँ सपनों में ही पूरा हुआ। -योगेश गोसावी २३ नवंबर, २०२०

खेल, मन का!

खेल, मन का! देखा है कभी मन में अपने झाँक कर? कुछ मैल वहां भी पडा मिलेगा। अधूरे ख़्वाबों का इल्जाम देकर, कितनों को वहाँ दफनाया होगा। वक्त मीले कभी तो एक एक टटोलना, बेबुनियाद इल्जाम देकर कितने मासुमों को तूने खुद दफनाया होगा। होते ये काम, अंदर चल रहा शोर कम होगा। आनेवाला हर इन्सान फिर तेरा दोस्त होगा। मन का ये खेल है निराला, जो चाहे वो ना मिले तो करता है मासूम बन ये कत्ल सारा। एक बात समझ यारा, हर ख्वाब गर होता मुक्कमल तेरा, खुदा या शैतान बन चला जाता तू छोड़ ये बसेरा। -योगेश गोसावी १५ सितंबर, २०२०

अच्छा नहीं लगता

अच्छा नहीं लगता कुछ तो गलत कर रहे है हम पर क्या? ये पता नहीं चलता। क्या करे समझ ना आये तब अच्छा नहीं लगता। सफर तो हर कोई कर रहा है। पूरा भी सब को करना है। किसी का पड़ाव इतनी जल्दी था।  ये सोच के अच्छा नही लगता। ऐसे निकल गया तू आधे रास्ते में, मिले तुझसे अरसा हुआ था। क्यूँ ना मिले फुरसत में कभी? याद करके अच्छा नहीं लगता। समझ आयी है किमत जिंदगी की, जो करना है आज, ये भी तय कर लिया दोस्त। पर ईसके लिये तुझे जाना पड़ा। ये जान के अच्छा नहीं लगता, अच्छा नहीं लगता। -योगेश गोसावी २२ जुलाई, २०२०

जिंदगी

जिंदगी गली में आखरी एक मकान है, सालों से आधा अधूरा ही है। रंग छोड़ो, दीवारें भी पूरी नही लगती। कभी उसे उजालों से जगमगाता नहीं देखा, पर हां, अंधेरेसे घिरा भी नहीं देखा। पता नहीं क्यूँ, ऐसा लगता है गली में बस वही जिंदगी रहती है। सुबह शाम हो या रात, कोई प्रहर हो, जिंदगी वहाँ खिलखिलाती सुनाई देती है। आते जाते हर कोई चौक जाता है, या कोई घृणासे नजर डालता है पर मन में ये संभ्रम जरूर ले जाता है कि कैसे? कैसे ये चहकते है? क्या ये राज है? एक दिन ठान लिया, टूटा सा उनका गेट पार करके रंग उड़ा हुआ दरवाजा खटखटाया। जिंदगी हसते हुए आयी, मुस्कुराकर अंदर बुला लिया! जादा कुछ था ही नहीं घर में जिसे हम सामान कहते है! पर हर एक चेहरा देखकर पता चला ये खुशी है, जिसे हम दिन रात घर से बाहर ढूंढते है। बिना वजह का मेरा आना उनको और खुशी दे गया और मेरी वजह छुपाना मुझे शर्मिंदा कर गया। गेट पर पहुँचते फिर पीछे मुडा, बोल दिया इरादा मेरा और कहाँ जानना था कैसे रहती है जिंदगी यहाँ ऐसे मुस्कुराते आज देखना था।  जवाब मिला, जिंदगी से हमने बस मुस्कुराना ही तो है मांग लिया। जरूरतें थोड़ी हमने कम पाल रखी है। इसलिए ही आते जाते हर...

ग्रीष्म बरखा

ग्रीष्म बरखा और ये शुरुआत है अंत की, ग्रीष्म के कहर की। है ये बरसात की, या किसीके अश्क की। मन में बस वहीं दिखेगा, जो है सोच में। वरना क्या भेद है, ग्रीष्म में बरसात में। जरूरी है वही है बरसता, दाह में या बूंदों में। कर बस इतना जतन, मन हो खुला हर हाल में।  -योगेश गोसावी २९ जून, २०२०

फोन

फोन हर बार फोन उठाकर रख देता हूँ फिरसे, सोचकर पिछली बार कब याद किया था उसने। दोस्ती है, तो उसे भी निभानी होगी, मैं भूल जाऊं तो उसे भी याद दिलानी होगी। एक तरफा प्यार है तो उसे दोस्ती कौन कहे? रिश्तों का सारा बोझ एक ही कब तक सहे। सब सोचकर, जानकर फोन मैं ही करूँगा, एक तरफा प्यार हो, दोस्ती हो, मैं ही निभाऊँगा। -योगेश गोसावी २८ जून, २०२०

ना मिलना!

ना मिलना! ना मिल के भी तुमने ऐसे एहसान किया, कुछ राज़ को ना चाहते हुए रोशनदान दिया। कभी पता ना चलते ऐसे राज़ खोले तुमने। ना मिलने का वक्त अच्छी तरह निभाया तुमने। ना मिलना भी इसकदर रास आया हमें। खुद को संभालना खुद ही को सिखाया हमने। -योगेश गोसावी २३ जून, २०२०

भागदौड़

भागदौड़ आसानी से मिलते हो तुम, थोड़े सस्ते हो क्या? गर बिकना है थोड़ा महंगा, तो बेपरदा दिखना जरूरी है क्या? दिखोगे गर आते जाते, तो कोई दाम न देगा। ना मिलोगे कहीं तो ढूंढकर बड़ा दाम मिलेगा। ये रीत है निराली न मिलनेवाली हर चीज है प्यारी। जो पास है उसकी कीमतें है कहाँ किसको जाननी। ये योगी संभाल तू अपना दामन, जो है मिला उससे भर ले अपना जीवन। ना भाग तू व्यर्थ उसके पिछे, जिसमें दिखा ही नहीं तुझे कभी अमन! -योगेश गोसावी २२ जून, २०२०

भांबावलेला मी!

भांबावलेला मी! स्वप्न पाहावीत की बोलावीत, काही कळेनासं झालयं! वर्तमान जगावा की भविष्य पाहावं, काही उमगेनास झालयं! आकांक्षांना माझ्या पंख फुटताहेत, की कोणा अपरिचिताचे हे संकल्प आहेत काही कळेनासं झालयं! दिन रात एकसमान वाटणारे हे विचार का थांबत नाहीत काही उमगेनास झालयं! जावे का ही अधिरता घेऊन त्या निसर्गात जो माझ्यातही आहे? की फुलवावा तोच अवतीभवती काही कळेनासं झालयं! द्विधा ही माझी, अधिरताही माझीच आणि तरीही भांबावलेला मीचं! दिशाहीन वाटतानाही प्रत्येक दिशा माझीच का वाटतेय कळेनासं झालयं! उमगत असेल तुला तर सांगशील थोडं मला ही! सगळं काही माझंच असून, अजून काहीतरी हवं का वाटतयं! ग्रीष्माच्या या तडाख्यातही थंड का वाटतंय, असं सगळं असूनही आत का आणि काय जळतयं? काहीच का कळेना आणि काहीच का उमगेना? हे दोन्हीं प्रश्न का छळताहेत मला काही समजेना! -योगेश गोसावी २५ मे, २०२०

फरिश्ता

फरिश्ता कुछ तो बात होगी, जो थम गये थे पलभर ये पाँव। दिल में शायद कोई तो कसक होगी, ना धूप देखी ना छांव। चलना ही जिंदगी है, तो ये थमना किस लिये? जाना ही है एकदिन, तो दिल का लगाना किस लिये? मुसाफिर हूँ, पड़ाव पे रुकना ही होगा। दो बातें सही, दिल का हाल बताना तो होगा। पड़ाव हो तो हम जैसे आयेंगे ही, पल दो पल दिल खोल के बैठेंगेही। गर नहीं चाहते तुम यूँ पलभर का रिश्ता, तो उठ औऱ चल मेरे साथ, बना दूँ तुझे फरिश्ता। -योगेश गोसावी ५ मई, २०२०

गप्पा

गप्पा कित्येकदा असं होतं, खूप बोलायचं असतं! पण वेळ नसेल, बिझी असेल, अस समजून टाळायचं असतं! का म्हणून काय विचारता? लगेच नाही येणार प्रतिसाद,  आपण आधीच थोडं आवरायचं असतं! आहेत बाकी अजूनही जवळचे, असेनात का!  असतील आपल्याहून आधीचे तर मग काय? वाट नाही बघवत आम्हांला कधी! गप्पांची सुनामी असतेच आमची अशी! म्हणून तर बरेच विषय न बोलताच संपतात! मनाचा एक कोपरा नेहमीच भरून ठेवतात! -योगेश गोसावी १ मे, २०२०

सुकून

सुकून आज फिर मेरा दिल रो पडा। लोग अच्छा बोले इसलिये किसी को मरना पडा। इंतजार उसके जाने का करते है, जीते जी एकबार जिक्र करना भी भूल जाते है। थोड़ी तो आदत बदलो मेरे यारो। जबतक है जान, दो बातें अच्छी कर ही डालो। जीते जी उसको थोड़ा सुकून मिल जाये, फिर चाहे जन्नत मिले या छूट जाये। -योगेश गोसावी ३० अप्रैल, २०२०

लॉकडाउन, एक वनवास!

लॉकडाउन, एक वनवास! खामोशसा ये जहाँ चीख चीख के कहता है, हमसे ना मिलके भी, हर कोई खुश रहता है। मिलनेका मौका पाना, किसे अच्छा नहीं लगता। पर खुद की जान के आगे, कुछ अच्छा नहीं लगता। ऐसा है, तो क्या सब ये रिश्ते नाते झुटे है? बिन मतलब के पाले, ये पालतू वेहम सारे है? रुको, ना पालो ऐसी सोच को दिमाग में। राम भी तो रहे थे, बिन सीता के वनवास में। किसी रावण का आना बहुत जरूरी होता है। तभी तो रामसा पुरुष, पुरुषोत्तम कहलाता है। -योगेश गोसावी १० अप्रैल, २०२०

रीत

रीत किसी और का एहसास हुआ, तो हर एक ने पूछा। जब खुद का एहसास हुआ, तो किसीने ना पूछा। कैसी है ये रीत दुनिया की, दूसरे के लिये तरसता है। खुद की बारी आये, तो युहीं मुकर जाता है। रीत ये तुम्हारी, कहीं तुम्हें ही न ले डूबे। हर बार किसी और के आंगन की धूल ही न बने। कुछ हो पाना तो, तुझे भी थोड़ा तड़पना होगा। होके बेकरार, तुम्हें भी तो कुछ करना होगा। -योगेश गोसावी ९ अप्रैल, २०२०

रास्तें

रास्तें रास्तों कों भी समझ ना आ रहा कि आखिर करना क्या? बिन हम मुसाफ़िरोंके युहीं पड़े रेहना क्या। चले दो कदम किसीके, तो उसे मंजिल दिला दे। आये ना गर कोई पास, तो किसे रास्ता दिखा दे? गुरुर उनका भी देखो, थोड़ा आज कम हो गया। बिन मुसाफिर के रास्ता भी, अपना होश खो गया। दो कदम ही सही, आज तुम्हें चलना होगा। मेरी खातिर ना सहीं, रास्ते के लिये कदम उठाना होगा। कदम ना तुम्हारें उनपर चले, तो रास्ता भटक जायेगा। मुसाफिर फिर हम जैसा, युहीं गुमशुदा रेह जायेगा। -योगेश गोसावी २७ मार्च, २०२०

आझादी

आझादी घरसे ना निकलना हमारा कुछ तो गजब ढा गया। परिंदो को थोड़ासा खुला आसमान दे गया। ना मिलना हमारा शायद थोड़ा बुरा होगा। ले लेने दो इनको ये मजा जो शायद फिर ना होगा। आझादी का मजा घर बैठ कर समझ आया। घूमती हुई दुनिया को जब थमता हुआ पाया। बस थोड़ेही दिनों की है ये बात, फिर होगी हर एक मुलाकात। आझादी का तब हम जश्ऩ मनायेंगे। ईन दिनोंको पर कभी न भुलायेंगे। -योगेश गोसावी २५ मार्च, २०२०

शायद

शायद पूछनी पडती है आजकल पसंद नापसंद, खुल के बोलने का जमाना गया शायद। देनी पडती है सबको ही अहमियत, खुद कमाने का जमाना गया शायद। चाहतों को भी चाहत से देखना आता है किसे याद। दुनियादारी कि होड़ में दिल को संभालना भूल गये शायद। -योगेश गोसावी २३ मार्च, २०२०

नींद

नींद बुला लिया किसीने जल्दीसे नींद को, कोई उसकी राह देखता रेह गया। राह देखते देखते उसकी, उसे कोई अनजान खयाल मिल गया। करली उससे बाते चार, तो मासूम वो मुस्करा गया। फिर थोडी और देर तक, वो खयाल नींद को दूर भगाता गया। चाहता गर बस नींद वो, जल्द उसे मिल जाती। वो ढूंड रहा था सुकून को, आप ही बताओ वो कैसे आती? -योगेश गोसावी २३ मार्च, २०२०

मिल का पत्थर

मिल का पत्थर राह चलते चलते मिला था मुझसे एकबार, मिल का पत्थर हस रहा था दूरसे बार बार। कुछ बता रहा था, कुछ पूछ भी रहा था। देख उसें मैं थोडा चौक भी गया था। बता रहा था राह सही है, मंज़िल तेरी दूर। पूछ रहा था क्यों आया अपनों को छोड दूर? सुन वो बात, थोड़ी देर मैं डगमगाया, कुछ पल बीते और पूनः लौट आया! मंजिल है दूर, पर जाना है वहीं, अपने भी आ रहे, मेरे निशानों को देख सही। मंजिले ऐसी कठिन, ना आयेंगी पकड़ में एकसाथ, किसीको तो बढना होगा आगे, अपनों का छोड हात। मिल जायेगा काफिला, मंजिल पे फिर एकबार, तब तक बस रखना तुम एक दूसरे पे ऐतबार। -योगेश गोसावी २९ जनवरी, २०२०

खयाल जिंदगी का

खयाल जिंदगी का खयालो में रहना है तो, कुछ तो करना होगा। आज है अपने पास, उसे थोडा तो सवारना होगा। कल गर लगे भटक गये थे हम, तो वापस भी आना होगा। दिमाग में चलते इस द्वंद्व को, थोडा तो संभालना होगा। मुश्किल नहीं राहे जिंदगी पे चलना, बस थोडा गिरना संभालना सिखना होगा! -योगेश गोसावी २१ जनवरी, २०२०

हिंदी पंक्तियां

जाने क्या कहना था ऊसे, मैंने सुना ही नहीं! बात खुद की करते करते, मैंने कुछ समझा ही नहीं! उलझा रहा अपनी उलझनों में, मैं इस कदर, जो मेरा ही था, मैंने ऊसे पाया ही नहीं! -गोसाव्यांचा योगेश ११ सितंबर, २०१९ क्यूँ पुछ रहे हो हाल जनाब,  सब आपको पता है। बिन मिले आपको जी रहे है, यही एक खता है। -योगेश गोसावी १३ सितंबर, २०१९ बातें ना भायी मेरी तो भूल जाना उन्हें! आयीना दिखाना हर किसिको आता नहीं। गर ठीक लगे तो चले आना। मुझे भी दिखाना परछाइंया मेरी! -योगेश गोसावी ८ अक्टूबर, २०१९ उसने एक बार पुछ क्या लिया,  देखो जैसे कयामत आ गयी! मुझ जैसे भले इन्सान पर,  एक दिवानगीसी छा गयी! -योगेश गोसावी १२ नवम्बर, २०१९ ना जाने कौनसे गली से मुडना था मुझे? ना जाने कैसे भटक गया हुं मैं? ये क्या सोच रहा था मैं की ईसी एक मुकाम पे अटक गया हूँ मैं! -योगेश गोसावी १५ नवम्बर, २०१९ बुलानेसे ना आयेगी, ना बतानेसे जायेगी, मौत हे वो यारो, मनचली माशुका ही रहेगी! -योगेश गोसावी १९ नवम्बर, २०१९ बदल गया हूँ मैं ईसकदर, अपनों को भी बेगाना लगने लगा हूँ। पा  कर तेरी चाहत को, मैं कुछ अकेलासा हो गया हूँ। -योगेश गोसावी २...

सीमायें

सीमायें दूरियां इन सीमाओंकी कब मिटेगी यारा? कब पनपेगा प्यार इनमें दोनों तरफ सारा? पहल शायद उसे करनी है जो रूठा है सदियोंसे, तू ही चला था सालों पेहले जुदा होके तेरे अपनोंसे। गले लगाने गर तू आये, तो हम हसके फैलाये बाहें, हिम्मत कर एकबार सर उठाके मिलाने वहीं निगाहें। हिन्द है हम, हिन्द ही रहेंग, ना समझ बस हिन्दू हमे। तोड़ वेहम सारे पुराने, बढ़ आगे, फैला अपनी बाह पसारे। -योगेश गोसावी १० जनवरी, २०२०

वाट.... हरवलेली

वाट...हरवलेली नेहमीच पायाखाली येणारी वाट आज अचानक हरवली, दाट धुक्याने जेंव्हा तिच्यावर आपली चादर ओढली. वर्षानुवर्षाचे आम्हीं सोबती आज अचानक अनोळखी झालो! मळभ हे बाहेरचे दाटून येता थोडेसे बावरलो! ओळख अशी वर्षांची थोडीच आपण विसरणार? क्षणभराची विश्रांती आणि पुन्हां ओळख जागी होणार! येता हे असे दाट धुके, व्यर्थ चिंता नको! क्षणिक असते ही व्यथा, उगाच त्याशी द्वंद्व नको! -योगेश गोसावी १० जानेवारी, २०२०