लॉकडाउन, एक वनवास!
हमसे ना मिलके भी, हर कोई खुश रहता है।
मिलनेका मौका पाना, किसे अच्छा नहीं लगता।
पर खुद की जान के आगे, कुछ अच्छा नहीं लगता।
ऐसा है, तो क्या सब ये रिश्ते नाते झुटे है?
बिन मतलब के पाले, ये पालतू वेहम सारे है?
रुको, ना पालो ऐसी सोच को दिमाग में।
राम भी तो रहे थे, बिन सीता के वनवास में।
किसी रावण का आना बहुत जरूरी होता है।
तभी तो रामसा पुरुष, पुरुषोत्तम कहलाता है।
-योगेश गोसावी
१० अप्रैल, २०२०
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