सफर प्यार का।
बदले रास्ते,
बदले हमसफर पुराने।
बस न बदली चाह मेरी,
सब को साथ रखने की।
एक खता हुई समझने में,
मंझिल सबकी अलग ही है।
तो ना चाहकर भी अलग ही होंगे रास्ते।
बिछडते रहेंगे सारे यूँही अपनी मंझिल के वास्ते।
कुछ देर और सही, चलना पड़ा अकेला।
मंझिल जब सामने थी, तब एहसास हुआ।
मंझिल गर होती सफर साथ चलने की,
तो कितनी खुशनुमा ये जिंदगी होती।
रुकना न पड़ता, बिछड़ना ना पड़ता,
सफर ये प्यार का अपने साथ चलते रहता।
-योगेश गोसावी
५ दिसंबर, २०२०
Comments
Post a Comment