आझादी
घरसे ना निकलना हमारा कुछ तो गजब ढा गया।
परिंदो को थोड़ासा खुला आसमान दे गया।
ना मिलना हमारा शायद थोड़ा बुरा होगा।
ले लेने दो इनको ये मजा जो शायद फिर ना होगा।
आझादी का मजा घर बैठ कर समझ आया।
घूमती हुई दुनिया को जब थमता हुआ पाया।
बस थोड़ेही दिनों की है ये बात,
फिर होगी हर एक मुलाकात।
आझादी का तब हम जश्ऩ मनायेंगे।
ईन दिनोंको पर कभी न भुलायेंगे।
-योगेश गोसावी
२५ मार्च, २०२०
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