सुलझी उलझने
बेवफा तो तू नहीं, पर वफा भी कहा कर रहा?
हजारो उलझने युं दिल में लेके चल रहा!
काफ़िला छूट जाये ईससे पेहले संभल तो जा जरा,
कुछ देर एक जगह बैठ अपनी उलझने तो सुलझा जरा!
उलझनेही है ये, सुलझ तो जायेंगीही।
कहा ये तुम्हांरे साथ आगेतक बढ पायेंगी।
हौसला तो कर उनसे सामना करनेका,
एक बार पलटकर तो देख काफ़िला अपनोंका।
आदमीही है तू, भगवान तो नहीं।
गिर कर उठना, उलझ कर सुलझना कुछ बुरा तो नहीं।
हौसला बुलंद रखं अपनी चाहतोंका,
एक दिन तू पा ही लेगा जहा मुक्कमल आसमानोंका।
-योगेश गोसावी
२० डिसेंबर, २०१९
Comments
Post a Comment