तेज तर्रार अकेलापन
कुछ खयाल निकले थे किताबोंसे, जिंदगी बदलने।
मोबाईल की रोशनी में जाने कहां खो गए।
मोबाईल की रोशनी में जाने कहां खो गए।
कुछ नगमे आए थे होठों पर।
दूरदर्शन की खनखनाहट में कहीं घुल गए शायद।
आवाज भी देनी चाही, कोई तो सुने।
भीड भी अब, गूंगी हुई है शायद।
क्यों तरसते हो यूं किसी की आहट के लिए,
खुशियां भी दबे पाव आके चली जाती है अक्सर।
जमाना अब तेज हुआ है योगी,
संभल जाना अब अकेलेही बेहतर।
-योगेश गोसावी
१० अगस्त, २०२१
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