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नया साल नये इरादे

और एक नया साल...पता नहीं ये अपने साथ क्या क्या ला रहा हैं? ये सारी दुनिया  ही उम्मीदों पर कायम हैं| चलो हम सब इस उम्मीद से इस साल का आगाज करते हैं की आने वाला साल हर एक को अपनी मन चाही खुशियाँ पाने का मौका दे|

"२०१०" बहुत सारी आशाएं, इच्छाएं, उम्मीदों के साथ आ रहा हैं| इन सब को पाने की कोशिश.....नहीं... इन सब को पाने के लिए हम सब मिल के साथ आयें| तभी हम कुछ कर सकेंगे| इस भाग दौंड की जिंदगी में हम आज कल एक दुसरे को कहाँ समझ रहे हैं, बस सब को जल्दी हैं किसी औरसे आगे जाने की| आओ सब साथ आयें और चले एक ओर जहाँ हो प्यार, दोस्ती और शांति|

मैं अपने परिवार की ओरसे आप सबको इसी के लिए शुभकामनाएं देता हूँ!

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ऊंची इमारत

ऊंची इमारत बस एक ही इमारत पता है मुझे, जो शुरू होती है ऊपर से और नीचे जमीन पे खत्म होती है। बचपन की उड़ाने जैसे मेरी, आसमान से शुरू होकर अब जमीन पे आयी है। कुछ चाहते थी, कुछ सपने थे। आसमान का एक टुकड़ा मिल जाए ऐसे अरमान थे। बढ़ती उम्र ने, दुनिया की रीत ने, पटका है जमीन पे ऐसे, जैसे नींद में गिरे हो अपने ही सपने से। इमारत अब भी वही है, बस अब गुजारा नीचे ही होता है। बचपन का गुजरा बचपना अब ऊपर चढ़ने से रोकता है। -योगेश गोसावी १८ सितंबर, २०२१

पाऊस परतीचा

पाऊस निघाला आज पुन्हा परतुनी तुझ्या माझ्या सगळ्या चिंब आठवणी! घेवून का ग जाईल तो ते सारे हळवे क्षण? की ठेऊन जाईल ओथंबलेले मनातले पण? का कोण जाणे त्याचे जाणे अन् येणे वेडावत...

बॅक बेंचर्स

बॅक बेंचर्स अस किती दिवस चालायच, आम्ही किती अस झुरायच? तुझ्या एका नजरेसाठी आम्ही कितीदा मरायच? तू एकदा तरी बघशील म्हणून आम्ही प्रत्येक लेक्चर करायच, तू मात्र त्या काळ्या फळ्याकडे डोळे वासून बघायच! तुला आवडत नाही म्हणून आम्ही मागचे बेंच सोडायचे, आणि तू मात्र त्यांच्याच बरोबर चहाचे दुकान गाठायचे! आता नाही अस कधी होणार, कुणी नाही झूरणार की कुणी नाही मरणार, तुला सोडून प्रिये आता आम्ही खालच्या वर्गात जाणार! --योगेश गोसावी १७ जानेवारी २०१३